जनसँख्या की बाढ़ से,उपजें जक्तिल सवाल
तापमान का मचलना ,सबसे बड़ा बबाल
ग्रीन हाउस के छेद का ,पसर रहा भूगोल
पंख न उसके यदि कटे ,आयेगा भूडोल
घोर प्रदूषण के थमेअगर ना बढ़ते पाँव
खुशहाली संसार की हार जायेगी दाँव
बर्फ ध्रुवों की पिघलना, अपशकुनी अभियान
सागर तट की आन का ,धराध्वस्त हो मान
ग्लेशियर सब पिघलकर ,कर देंगे उद्विग्न
सागर तट की बस्तियां ,सब होगीं जलमग्न
त्राहि ताहि मच जायेगी ,धुंआ धुंआ हों स्वप्न
मिटटी में मिल जायेंगे ,सब विकास के यत्न
तीखे तेवर ताप के ,खींचे अपने तीर
सर सरिता निर्झर कहें ,पीर हुई वेपीर
बेमौसम बरसात हो ,मरुथल का विस्तार
ऋतुओं का क्रम होबिफल ,तापमान की मार
ताप प्रदूषण कोख में,प्रलय स्रष्टि संहार
वन उपवन बन जायेगें ,सभी राख के ढेर
ताप प्रदूषण ना करे ,तनिक भी इसमें देर
लगातार ओजोन का, होता क्षरण घनत्व
जीवन कैसे खिलेगा ,बचे न जीवन तत्व
जीवन का आधार है ,जब ओजोन वितान
विश्व दिवस ओजोन पर क्यों न दे सम्मान
[विश्व ओजोन दिवस :१६.०९.१०]
Saturday, September 25, 2010
Wednesday, September 15, 2010
एक बार ,बस,साल में
लोकतंत्र के पहरुए ,सब काले अँगरेज़
अंग्रेजी सिर पर चढी ,हिंदी से परहेज़
हिंदी को जग जानता ,जन मन गण की चीज़
हमें फिरंगी दे गए ,अंग्रेजी विष बीज
भाषण भाषा भाव में ,अंग्रेजी की गंध
सूरज चन्दा ने किये,खरे खरे अनुबंध
राजनीति तन मन बसा ,तोड़ फोड़ षड्यंत्र
भाषा ,जातिविबाद का ,जपती रहती मन्त्र
आकर हिंदी गाँव से.होय शहर में मौन
अंग्रेजी के सामने ,पूछे उसको कौन
न्यायालय के कंठ में ,अंग्रेजी के बोल
हिंदी जाती है बहाँ ,रोज़ चुकाने मोल
मंदिर मस्जिद तीर्थ में ,सेना या बाज़ार
हिंदी साधू संत की ,बने गले का हार
ताले खोलें तालियाँ ,अंग्रेजी का मन्त्र
हिंदी का सिम सिम लगे,शासन को षड्यंत्र
पद पाने की होड़ में ,अंग्रेजी अनमोल
उत्तर हिंद में दिए ,बिस्तर उसका गोल
जहां कहीं हिंदी करे ,हिंदी में फ़रियाद
अंग्रेजी में फिर बहाँ ,घाटों चले विवाद
हिंदी की खा रोटियाँ ,होनी से परहेज़
सोचो तो उनसे भले ,सचमुच में अँगरेज़
भावी पीढी गा रही,अंगेरजी के गीत
हिंदी बरसों बाद भी ,रहती है भयभीत
रोज़ मीडिया परसता,अंग्रेजी में प्रश्न
सपने हीनी के छीने,लटके अनगिन प्रश्न
त्याग समर्पण सौंप दे ,हिंदी को वर्चश्व
पिघल पिघल बह जाएगा,अंगेरजी सर्वस्व
अंग्रेजी रंग में रंगा ,लोकतंत्र का तंत्र
एक बार बस साल में ,जपता हिंदी मन्त्र
हिंदी की है दुर्दशा ,अंग्रेजी को मन
हीनी दिवस मना रहा ,रो रो हिन्दुस्तान
जब अपने ही राज में ,हिन्दी का अपमान
दुनिया हमसे पूंछती ,कैसा हिन्दुस्तान
[भोपाल:११..०९.०६]
अंग्रेजी सिर पर चढी ,हिंदी से परहेज़
हिंदी को जग जानता ,जन मन गण की चीज़
हमें फिरंगी दे गए ,अंग्रेजी विष बीज
भाषण भाषा भाव में ,अंग्रेजी की गंध
सूरज चन्दा ने किये,खरे खरे अनुबंध
राजनीति तन मन बसा ,तोड़ फोड़ षड्यंत्र
भाषा ,जातिविबाद का ,जपती रहती मन्त्र
आकर हिंदी गाँव से.होय शहर में मौन
अंग्रेजी के सामने ,पूछे उसको कौन
न्यायालय के कंठ में ,अंग्रेजी के बोल
हिंदी जाती है बहाँ ,रोज़ चुकाने मोल
मंदिर मस्जिद तीर्थ में ,सेना या बाज़ार
हिंदी साधू संत की ,बने गले का हार
ताले खोलें तालियाँ ,अंग्रेजी का मन्त्र
हिंदी का सिम सिम लगे,शासन को षड्यंत्र
पद पाने की होड़ में ,अंग्रेजी अनमोल
उत्तर हिंद में दिए ,बिस्तर उसका गोल
जहां कहीं हिंदी करे ,हिंदी में फ़रियाद
अंग्रेजी में फिर बहाँ ,घाटों चले विवाद
हिंदी की खा रोटियाँ ,होनी से परहेज़
सोचो तो उनसे भले ,सचमुच में अँगरेज़
भावी पीढी गा रही,अंगेरजी के गीत
हिंदी बरसों बाद भी ,रहती है भयभीत
रोज़ मीडिया परसता,अंग्रेजी में प्रश्न
सपने हीनी के छीने,लटके अनगिन प्रश्न
त्याग समर्पण सौंप दे ,हिंदी को वर्चश्व
पिघल पिघल बह जाएगा,अंगेरजी सर्वस्व
अंग्रेजी रंग में रंगा ,लोकतंत्र का तंत्र
एक बार बस साल में ,जपता हिंदी मन्त्र
हिंदी की है दुर्दशा ,अंग्रेजी को मन
हीनी दिवस मना रहा ,रो रो हिन्दुस्तान
जब अपने ही राज में ,हिन्दी का अपमान
दुनिया हमसे पूंछती ,कैसा हिन्दुस्तान
[भोपाल:११..०९.०६]
Wednesday, March 31, 2010
प्रदूषण बनाम वैश्विक ताप
करते वातावरण विद ,खरा खरा एलान
प्रलय बाढ़ ने कस लिए,अपने तीर कमान
कोपेनहेगन में हुआ ,खूब विचार विमर्श
बढ़ते वैश्विक ताप पर ,निकले सच निष्कर्ष
प्रलय बाढ़ ने कस लिए,अपने तीर कमान
कोपेनहेगन में हुआ ,खूब विचार विमर्श
बढ़ते वैश्विक ताप पर ,निकले सच निष्कर्ष
आतंकी का रूप धर ,आया वैश्विक ताप
छोटे मोटे द्वीप तट ,झेल रहे अभिशाप
छानी छप्पर टपरिया ,शिमला नैनीताल
सभी जगह भूचाल मौसममें अब आ गया
भूल गया पारा अरे ,परम्परागत चाल
बैरोमीटर की कहीं ,अब ना गलती दाल
हवा हवा की निकलती ,हुई हवा हैरान
लूह लपट के रूप में ,बनी क्रूर शैतान
सांसत में अब फंस गयी ,तापमान की सांस
ग्लोवलवार्मिंग की सजा ,पडी गले में फांस
दलने छाती पर लगीं ,रवि किरणें जब दाल
तापमान के आन की काम न आये ढाल
बर्फ ध्रुवों की पिघलती ,धरे भैरवी रूप
पशु पंछी इन्शान के ,रही नहीं अनुरूप
ग्लेशियर अब हो रहे ,शनैः शनैः बीमार
बाद प्रलय की सूचना ,जन जीवन संहार
बाहन ढेरों चिमानियाँ ,उगल रहीं अभिशाप
पर्दूषण भूगोल का ,हुआ असीमित माप
वन उपवन के गाँव में ,कांक्रीट की बाढ़
मरुथल पाँव पसारता ,मिटे झाड झंकाड़
पानी पानी हो गए ,अब जलधर के ठाट
माथा अपना ठोकते ,कुआं बाबड़ी घाट
भ्रष्टाचारी प्रदूषण ,रचे नया इतिहास
सब दुनिया को हो गया ,खरा खरा अहसास
ग्रीनहाउस के छेद का ,बदल रहा भूगोल
थमीं नहीं यदि चाल तो ,आएगा भूडोल
घोर प्रदूषण यातना ,हम सबका है पाप
आने वाली पीदियाँ ,भोगेगी अभिशाप
जब दुनिया हो जाएगी,बाढ़ प्रलय जलमंग्न
[भोपाल:०१.०४.१०]
Sunday, January 24, 2010
माँ की ममता
माँ की ममता के लिए मिले नहीं उपमान
ढूंढ ढूंढ कर थक गए तुलसी सूर महान
किलकारी जब खेलती ,खेले सब संसार
परिजन मन मन हीं man hanse
ढूंढ ढूंढ कर थक गए तुलसी सूर महान
किलकारी जब खेलती ,खेले सब संसार
परिजन मन मन हीं man hanse
Saturday, January 16, 2010
आनंद क दोहे :मुस्कान
राई -सी मुस्कान से ,पर्वत जैसे पीर
पानी पानी बन झरे ,जैसे निर्झर नीर
अधरों से मोनालिसा ,बाँट रही मुस्कान
मरकर भी जीवित अभी ,कला जगत की शान
सुरा सुरैया माधुरी ,मधुर अधर मुस्कान
आँख मींच पहचान लो ,जाने सकलjahaan
पानी पानी बन झरे ,जैसे निर्झर नीर
अधरों से मोनालिसा ,बाँट रही मुस्कान
मरकर भी जीवित अभी ,कला जगत की शान
सुरा सुरैया माधुरी ,मधुर अधर मुस्कान
आँख मींच पहचान लो ,जाने सकलjahaan
Sunday, June 21, 2009
बारहमासा दोहों में
महुआ जामुन आम का ,बौराए जब बौर
हसीं खुशी से चेत में , सब के मुह में कौर
सरसों गेहूं चना से ,मुस्काये जब खेत
होरी को बैशाख दे ,नवजीवन संकेत
रो रोम से जब बहे ,नदी पसीना धार
जेठ दुपहरी तब करे ,वार वार ,बस वार
कजरारे घन सघन हों ,बरसें कहें अषाढ़
दादुर मोर किसान के ,घर खुशियों की बाढ़
सावन की रिमझिम भली ,भाइ बहन त्यौहार
दार दार झूला परे,पेंगों का उपहार
थामे ण भादों में अरे ,वर्षा की रफ़्तार
छानी छप्पर सिसकते ,जन जीवन लाचार
पित्रपक्ष पक्ष की धूम हो ,घर घर आय बुखार
मच्छर झींगुर काग का, स्वागत करे क्वार
अन्धकार को बिदा दें,दीवाली के दीप
राम आगमन अबध में कातिक लिखता टीप
अगहन अगवानी करे ,जाने गौना रीति
राधा सी नाचने लगे ,भूली बिसरी प्रीति
पूस मॉस में पेलती,क्रूर ठण्ड जब दंड
तब आलाव करने लगे ,कीर्तन भजन अखंड
माघ मास पाला पड़े ,हो किसान हैरान
फसलें ढोतीं है सदा ,अनचाहा नुक्सान
मन ब्र्न्दाबन रंग रागे ,बरसाने की फाग
गागुन वन वागन नाचे ,जले पलाशन आग
[भोपाल :०७.१०.ओ६]
हसीं खुशी से चेत में , सब के मुह में कौर
सरसों गेहूं चना से ,मुस्काये जब खेत
होरी को बैशाख दे ,नवजीवन संकेत
रो रोम से जब बहे ,नदी पसीना धार
जेठ दुपहरी तब करे ,वार वार ,बस वार
कजरारे घन सघन हों ,बरसें कहें अषाढ़
दादुर मोर किसान के ,घर खुशियों की बाढ़
सावन की रिमझिम भली ,भाइ बहन त्यौहार
दार दार झूला परे,पेंगों का उपहार
थामे ण भादों में अरे ,वर्षा की रफ़्तार
छानी छप्पर सिसकते ,जन जीवन लाचार
पित्रपक्ष पक्ष की धूम हो ,घर घर आय बुखार
मच्छर झींगुर काग का, स्वागत करे क्वार
अन्धकार को बिदा दें,दीवाली के दीप
राम आगमन अबध में कातिक लिखता टीप
अगहन अगवानी करे ,जाने गौना रीति
राधा सी नाचने लगे ,भूली बिसरी प्रीति
पूस मॉस में पेलती,क्रूर ठण्ड जब दंड
तब आलाव करने लगे ,कीर्तन भजन अखंड
माघ मास पाला पड़े ,हो किसान हैरान
फसलें ढोतीं है सदा ,अनचाहा नुक्सान
मन ब्र्न्दाबन रंग रागे ,बरसाने की फाग
गागुन वन वागन नाचे ,जले पलाशन आग
[भोपाल :०७.१०.ओ६]
Saturday, June 20, 2009
सन्नाटे में गाँव
बाग़ बगीचे गाँव में ,खो बैठे पहचान
आम जाम जामुन हुए ,बाज़ारों की शान
पीपल बरगद नीम ने ,खींच लिए हैं हाथ
हमने ही जबसे दिया ,नीलामी का साथ
ताल तलैया नहर के ,बदल गए हैं पाट
अन्धकार में रौशनी, लिए गाँव में हाट
गायब सब पगदंदियाँ ,खा चकबंदी मार
सड़कें जोडें गाँव के,अब शहरों से तार
सड़क गाँव को ले गई, फुटपाथों की छाँव
संनते में भटकते ,छानी छप्पर गाँव
अत पात पीले झरे ,खड़े पेड़ सब ठूंठ
जगर मगर सब शहर की ,गयी गाँव से रूठ
ठिठुर ठिठुर ठंडा हुआ ,होरी धनिया गाँव
रातरात भर तापता ,जान बचाय अलाव
घर आँगन बरसात में ,कीचड दलदल गाँव
पछताते नर नारियाँ,जामे रोग के पाँव
जमींदार खोखल हुए ,बेंचे खाएं खेत
धन दौलत इज्ज़त हुई,ज्यों मुठ्ठी में रेत
जिनके घर में थी नहीं ,कौडी भून्जीं भांग
हाथ पसारे गाँव की ,पूरी करते मांग
भूमिहीन हैं गाँव में ,ऋण से लदे किसान
दानों को मुहताज है ,संकट में ईमान
बांग न मुर्गों की मिले ,बन बागन में मोर
जकडे सारे गाँव को ,बाघ भेड़िया शेर
घर आँगन खलियान का ,बदल गया भूगोल
गली गली में डोलता ,राजनीति भूडोल
टॉप तमंचा गोलियाँ ,घर घर चौकीदार
पकड़ फिरौती मांग में ,शामिल रिश्तेदार
शाम ढले कपने लगे ,थर थर सारा गाँव
द्वार देहरी में बधें,नर नारी के पाँव
कहाँ न जाने खो गए ,रेशम से सम्बन्ध
खान पान अनुराग के ,भंग हुए अनुबंध
[भोपाल:२८.०१.०५]
आम जाम जामुन हुए ,बाज़ारों की शान
पीपल बरगद नीम ने ,खींच लिए हैं हाथ
हमने ही जबसे दिया ,नीलामी का साथ
ताल तलैया नहर के ,बदल गए हैं पाट
अन्धकार में रौशनी, लिए गाँव में हाट
गायब सब पगदंदियाँ ,खा चकबंदी मार
सड़कें जोडें गाँव के,अब शहरों से तार
सड़क गाँव को ले गई, फुटपाथों की छाँव
संनते में भटकते ,छानी छप्पर गाँव
अत पात पीले झरे ,खड़े पेड़ सब ठूंठ
जगर मगर सब शहर की ,गयी गाँव से रूठ
ठिठुर ठिठुर ठंडा हुआ ,होरी धनिया गाँव
रातरात भर तापता ,जान बचाय अलाव
घर आँगन बरसात में ,कीचड दलदल गाँव
पछताते नर नारियाँ,जामे रोग के पाँव
जमींदार खोखल हुए ,बेंचे खाएं खेत
धन दौलत इज्ज़त हुई,ज्यों मुठ्ठी में रेत
जिनके घर में थी नहीं ,कौडी भून्जीं भांग
हाथ पसारे गाँव की ,पूरी करते मांग
भूमिहीन हैं गाँव में ,ऋण से लदे किसान
दानों को मुहताज है ,संकट में ईमान
बांग न मुर्गों की मिले ,बन बागन में मोर
जकडे सारे गाँव को ,बाघ भेड़िया शेर
घर आँगन खलियान का ,बदल गया भूगोल
गली गली में डोलता ,राजनीति भूडोल
टॉप तमंचा गोलियाँ ,घर घर चौकीदार
पकड़ फिरौती मांग में ,शामिल रिश्तेदार
शाम ढले कपने लगे ,थर थर सारा गाँव
द्वार देहरी में बधें,नर नारी के पाँव
कहाँ न जाने खो गए ,रेशम से सम्बन्ध
खान पान अनुराग के ,भंग हुए अनुबंध
[भोपाल:२८.०१.०५]
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