Thursday, July 11, 2013

दुखद त्रासदी किसका दोष ?

दुखद त्रासदी के लिए ,मढ़े प्रकृति सिर दोष
भूल न अपनी मानते ,लीला उसका कोष

अंधाधुंध विकास ने ,खोले बिपदा द्वार
प्रकृति नाती ने हार कर ,ड़ाल दिए हथियार

बाँध और झीलें बनी ,सभी दानवाकार
घन -बिस्फोटन के लिए ,बनती हैं आधार

वन पर्वत सरिता हुईं ,तन मन से लाचार 
घोर प्रदूषण की सहें , बोलो कैसे मार

सकल वनस्पति तंत्र में ,लगा चुके हम आग
बोलो कैसे गायेगी ,प्रकृति बिचारी फाग

प्रकृति साथ हम कर रहे ,आये दिन खिडबाद
कांक्री ट  जंगल उगे ,बैठे उनकी आड़

पर्यावरण बिनाश का ,हमने बोया बीज
सह्न शक्ति अब ना रही ,आती उसको खीझ

पर्यावरण बिनाश की ,बाढ़ प्रलय हैं पीर
रोदन अब थमता नहीं ,बहता खारा नीर

जितनी भी परियोजना ,सभी लाभ के दांव
सीधे सरल विकास के ,उखड गए हैं पाँव

पर्यावरण बिनाश की ,सुनी नहीं यदि टेर
महाप्रलय  मूंह बाएगी ,भले लगे  कुछ देर 
       

Wednesday, June 26, 2013

khand

                                                      खंड खंड उतराखंड 
बाढ़ प्रलय का रूप धर ,लगी पेलने दंड
खंड खंड सब हो गया ,अचल उत्तराखंड

देव भूमि ने ले लिया ,असुर भूधराकार
अवनी अम्मवर में मचा ,रोदन हाहाकार

भव्य भवन बाहन बहे ,ज्यों आंधी में पात
पानी पानी हो गई , सदियों की सौगात

प्रलय सरीखी बाढ़ ने ,ढाया ऐसा क़हर
जो जल जीवन  है ,बही बन गया ज़हर

गाँव शहर सब कुछ बहा,उखड़े सबके पाँव
कोई चिन्ह बचा नहीं ,बांचें जिससे नांव

जाने कितने बह गए ,कितने लिए समाधि
पता नहीं कल कौन सी ,गले पड़ेगी व्याधि

थमीं हुई हर सांस पर ,सासें थामें लोग
बाधें बैठे आस सब , कब आये संयोग

आँख सामने टूटती ,अपनों की जब सांस
जीवन भर भूलें नहीं ,कटे न दुःख की फांस

आँखें पथरा सी हुईं ,जिसने देखा द्रश्य
मगर लुटेरे लूटकर ,हो जाते अद्रश्य

जो सबके ही नाथ हैं ,क्या हो गए अनाथ
देख देख हैरान सब ,ठोंक रहें हैं मांथ 


 

Monday, December 24, 2012

इस गुस्से का देश को ,दो गे क्या अंजाम

आये दिन होने लगे ,सामूहिक अपराध
बहन बेटियों की अरे ,तार तार हर साध

सामूहिक दुष्कर्म की,लम्बी लगी कतार
मंत्री संत्री से जुड़े    ,गिन लो तार हज़ार

सामूहिक दुष्कर्म पर ,मचा हुआ कुहराम
इस गुस्से का देश को ,दो गे  क्या अंजाम

गली गली में हो रहा ,गुस्से का इज़हार
मुख प्रष्ठों पर छापते ,देखो सब अखबार

सभी पहरुए देश के ,साधे  बैठे मौन
बहन बेटियों की सुने,चीख पुकार कौन

सत्ताधीशों ने सुनी .ज्यों ही चीख पुकार
अपने महलों में छुपे करके बंद किवार

पुलिस हाथ में फहरते .लाठी डंडा मार
बेगुनाह सब झेलते ,मार पीट का भार

नवयुवकों की भीड़ ने ,छोड़ा जो अभियान
 हक्का बक्का तंत्र हो,खो बैठा पहचान

नवयुवकों की भीड़ में ,असली हिन्दुस्तान
सामूहिक दुष्कर्म का ,मांगे सही निदान

बुझे बुझाए ना बुझे,दुष्कर्मों की  आग
गिनती करना है कठिन ,इतने अनगिन दाग

जूँ रेगेगी कान पर ,कब ओ सत्ताधीश
अपराधी के सामने ,खड़े निपोरे खीश

देश अस्मिता हो रही ,दुनिया में बदनाम
अपराधी को छूट से ,नहीं बनेगा काम

सामूहिक सहयोग से,मिट सकते दुष्कर्म
शासन जनता समझ ले, सीधा साधा मर्म
[भोपाल:24.12.2012]

Friday, November 2, 2012

शरदपूर्णिमा

शरद पूर्णिमा चाँदनी ,ज्यों चांदी की धूप
सकल गगन शासन करे ,चाँद अकेला भूप 
राजकुमारी चांदनी ,तारों सज्जित हार                                      
दशों दिशा में झूमती ,मस्ती भरी बहार
रवि दादा की हेकड़ी ,चारों खानों चित्त
शरद चाँदनी धवल तन,मोहे सबका चित्त
शरदपूर्णिमा चाँदनी ,बरसे अमृत धार
सब मन ब्रजनंदन बने ,भक्ति प्रेम रसधार
शरद चाँदनी में घुला ,गंगा जमुना नीर
खीर पकाकर जो पिए ,छूमन्तर हो पीर
शरद चाँदनी में खिले ,ताजमहल का रूप
शाहजहाँ मुमताज़ के ,अमर प्रेम की धूप
सागर लहरें माँगतीं ,प्यार प्यार बस प्यार
शरद चाँदनी से मिलीं ,उमड़ा मन में ज्वार
भीगी भीगी चाँदनी ,मन सपनों की ओट
तन्हाई में मेनका ,रह रह खाए चोट
चाँद इशारा कर रहा ,प्यार करो भरपूर
बहकी बहकी चाँदनी ,कुछ कुछ करे गुरूर
बौराए कुछ घूमते ,प्रेम पिपासा रोग
कवि  शायर बुरा गए ,ऐसा अद्भुत योग
 पिहू पिहू सुन रात में ,गई अचानक जाग
जल भुन कोयला ,उर्वशी ,हाय बुझे ना आग
अरे हाय अब क्या करूँ ,प्रियतम बड़े कठोर
शरदपूर्णिमा  चाँदनी ,कोरी आँखों भोर
धूप  छाँव आवागमन ,शूल फूल का मेल
 हिम्मत रखो पहाड़ -सी ,हँस हँस खेलो खेल
शरदपूर्णिमा ने दिए ,अज़ब गज़ब उपहार
धुप छाँव परवेश ने ,बदल दिया व्यवहार
शरदपूर्णिमा चांदनी ,अमृत रस का घोल
घुल जाए जब खीर में ,खीर बने अनमोल
शरदपूर्णिमा चाँदनी ,जगर मगर जब होय
तम जा अपने नीड़ में ,ओड़ चादरा सोय
[भोपाल :26.10.2007] 

Wednesday, February 15, 2012

कूँची कवि दर्शक छके :ग्रांड कैनियन देख


कूँची कवि दर्शक छके :ग्रांड कैनियन देख
[एरिज़ोना अमेरिका का प्राक्रतिक सातबां आश्चर्य ]

नदियाँ तो देखीं निरीं ,पर न ऐसी एक
चप्पे चप्पे पर  लिखे ,जिसके लेख अनेक

कोलोरोडो नदी का ,रहस्यमई इतिहास
नई नई खोजें लिए ,नया नया इतिहास

आँख मिचौनीं खेलती ,कुशल नदी की धार
जो जितना गहरा धँसा,लाया उतना सार

ऊंचे मौन पठार पर ,पड़े क्षरण के घाव
ग्रांड कैनियन जनम दे ,धंसें नदी के पाँव

क्षरण सदा चलता रहा ,बस चीटी की चाल
कागज़ सीं पतलीं परत ,कहतीं सच्चा हाल

धरती के निर्माण की ,कहती कथा विशेष
पढ़ने बालों ने  पढ़े ,परत  दर परत लेख

दुनिया  में अद्भुत  अजब ,ग्रांड कैनियन द्रश्य
अरबों बरसों का छिपा , जिसमें सच्चा सत्य

चट्टानों की विविधता .विविध शिल्प के अंग
तरह तरह की धातुएं ,तरह  तरह के रंग

जन जीवन प्राणी जगत ,तट पर हुआ निहाल
अंकित घाटी  में मिला  ,सबका सच्चा हाल

दो दो बाँधों का दिया ,अमिय सरस उपहार
जन जीवन ने खुशी का ,पहना अनुपम हार

जिसने जो चाहा उसे ,मिला बही संवाद
कूँची कवि दर्शक थके ,कर कर के अनुवाद

[ग्रांड कैनियन नेशनल पार्क एरिजोना :अमरीका :१३.०2.२०1२]

Wednesday, December 28, 2011

पर्यावरण दिवस त्यौहार

तापमान का उछालना , ग्रीन्होल संबाद
ग्लोबल वार्मिंग कर रहे ,प्रदूषण अनुवाद
कचरा उत्पादन बना ,बड़ा भयंकर रोग
आज जरूरत है बड़ी ,समझें इसको लोग
प्रदूषण भूगोल का ,सिमटे जब आकार
ग्लोबलवार्मिंग पर कटें,सपना हो साकार
जल थल वातावारण में ,घुला जहर ही जहर
बदले तेवर ताप के ,उगल रहा है कहर
अगले डेढ़ दशक में ,ग्लेशियर अवशेष
बड़े शहर कुछ द्वीप भी ,हों इतिहास विशेष
जनसंख्या की बाढ़ से ,घटते जंगल जीव
मगर खोखली हो रही ,सुख सपनो की नीव
लेता है अगडाइयां, जल थल का इतिहासनए नए भूगोल का, नकशा होगा ख़ासप्रदूषण भूगोल का ,सिमटे यदि आकारग्लोबल वार्मिंग पर कटें ,सपनें हों साकारअतिरिक्त ऊर्जा स्रोत के ,यदि हम जोड़ें योगप्रदूषण की कोख के ,दूर भगेगें रोंग
अक्षय ऊर्जा श्रोत के ,जल सूरज हैं वायु
उनके खर्चे नपे तुले ,घटे प्रदूषण आयु
हो विकास जब हर तरफ ,बिना प्रदूषण मार
सुख वैभव का राज़ हो ,हराभरा संसार
दुनिया में अब तंत्र के ,खड़े हो गए काननयी नयी नजत योजना ,खीचें सबका ध्यानजन गण मन में जब जगे ,जागरूकता आगपर्यावरण विनास का ,धुले सदा को दागपर्यावरण दिवस का ,हर दिन हो त्योहार
मौसम का बदले तभी ,जग चाहा व्यवहार
[भरूच:०५.०६.२०१०]।

Sunday, December 18, 2011

mantriyal gungaan

          मांट्रियल गुणगान :आनन्द के दोहों में 

मांट्रियल की भव्यता ,मन- मोहक  मन -  मीत
कवि मन को करती विवश, गाओअभिनव गीत
मांट्रियल    सबसे    बड़ा ,क्यूबेक  का शहर
घनी बस्तियों के जमें  ,जहां अंगदी पैर
कहीं पुरानी बस्तियां ,कहीं आधुनिक  शहर
गगन चूमती चिमनियाँ ,उगल रहीं हैं ज़हर
छोटे छोटे घर कहीं ,बीच शहर से दूर
गगन चूमतीं बस्तियां ,करें उन्हें मजबूर
विध्द्या धन व्यापार का ,मांट्रियल है गाँव
नाम कमाने में कभी ,नहीं हारता     दाँव
ओलम्पिक टावर खडा ,अपना सीना तान
थकें नहीं यश गान में,दुनिया के मेहमान
पन्नों में इतिहास के ,मांट्रियल के काम
पग पग पर उनकें लिखें ,शिलालेख पर नाम
ईंट पत्थरों ने बुनें ,घर सड़कें बाज़ार
ईटनसेंटर मॉलमें ,मन चाहे उपहार
विज्ञान केंद्र में जब घुसो, दिखे डायनासोर
वैज्ञानिक जिनसे पढ़ें,जीव -जनम का भोर
साधन सब आवागमन ,खानपान सुखधाम
जिसको जैसा चाहिए ,उसको बैसा काम
गोरे गोरे तन वदन, सबको ह्बोश-हबास
सब दुनिया से आ बसे,फ्राँस देश के ख़ास
फ्रेंच फ्राँस की धरोहर ,मांट्रियल पहचान
सकल विश्व यह जानता,देता है सम्मान
दुनिया में ऐसे शहर ,गिनना है आसान
जिनका शाम सुवहदिवस,गाता है गुणगान
स्वर्ण अक्षरों में लिखा, मांट्रियल का नाम
बाँट रहा आनन्द धन ,सब जग को अविराम
[मांट्रियल -ग्रान्द्फल्स कर यात्रा :१७.१२.२०११]
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Tuesday, May 31, 2011

फूले फले पलाश

अमलतास हसने लगा ,सुन फागुन के फाग
टेसू वन में लग गई, बिना लगाये आग
जन गण मन खुश हो रहा ,गाता फागुन फाग
बुझे बुझाए ना बुझे,लगी पलाशन आग
हर ऋतु के तेवर अलग ,अलग अलग पहचान
मधुरितु आकर फूँकती , वन पलाश में प्राण
मन वृन्दावन रंग रगा ,बरसाने की फाग
लाल लालरंग में रंगें ,जब पलाश के पेड़
पता नहीं लगता कहाँ ,पत्ते दिए खदेड़
झर झर झर झरने लगें ,जब पलाश के फूल
लाल लाल तेवर तने,बन जाते हैं धुल
पिचकारी में रंग भरा ,होली का त्यौहार
दिया उधार पलाश ने ,दोनों हाथ पसार
सारा जग यह जानता ,तीन ढ़ाक के पात
उछल कूद बस कर सकें , तीन दिनों की बात
चार दिनों की चाँदनी ,फूलें फले पलाश
रूठे जब मधुमास तो ,होता खूब हताश
महुआ जामुन आम का ,बौराए जब बौर
वन में किंशुक फूल तब ,खिलते बन सिरमौर
जंगल में मंगल करे ,हँसे खिले जब मधुमास
पंख कल्पना को लगे ,जैसे खिलें पलाश
[भोपाल :३०.०५.२०११]









Sunday, February 6, 2011

वसंत का परिपत्र

लाख पतझड़ की क्रूरता ,हुआ वसंत उदास
आँखों में तिरने लगा ,समय समाज समास
आनन फानन कर दिया ,जारी फिर परिपत्र
सबने रेखांकित किया,सुभागमन नवसत्र
संवरे सजे वसंत ने ,किया विशद ऐलान
पतझर भौचक्का हुआ ,भगा छोड़ मैदान
तितली भौरों ने रचे , नए- नए संवाद
खिले अधखिले फूल का ,किया तुरत अनुवाद
कलियाँ मन हीं मन ,हंसीं होंगे पीले हाथ
जीवन पथ पर बढेंगे ,साथ साथ हाँ साथ
राधा बन नचने लगी ,गाये मीरा गीत
कोयल के मन में जगी ,प्रेमप्रीत नवनीत
खिले फूल बागन नचे ,लगी पलाशन आग
धरा गगन गाने लगा ,फाग फाग बस फाग
महकी सकल वसुंधरा ,पिघला जनगण ताप
दुख्दार्दों के धुल गए ,बचे खुचे संताप
यत्र तत्र सर्वत्र है ,चर्चा का सन्दर्भ
सजाधजा मधुमास ज्यों ,सचमुच में गंधर्व
जंगल में मंगल करे ,यह वसंत की रीति
विरहिन मन में उमगती ,परदेशी की प्रीति
सपने बनकर उड़ रहे ,जैसे उड़े वसंत
थाह न कोई पा सका ,पंडा मुल्ला संत
बरसाने के फाग का ,डंडा लिए वसंत
रंग गुलाल उड़ा रहा, ओर न छोर अनंत
फूल फूल को सूंघती ,बजा रही है ढोल
सबमें गंध सुगंध कहाँ ,हवा खोलती पोल
पीली पीली ओढ़नी , हरा घाघरा रंग
सरसों दुलहन रूप लख ,जग सारा है दंग
खेत बाबरे हो गए ,रहीं न फसलें बाँझ
तारे झिमिल जल उठे ,आई ज्यो ही साँझ
काना मटर के खेत में ,दमके जुगुनू फूल
फसल सुहागिन का कभी, गलत न हो अनुमान
पुलकित हर खलिहान हो ,पुलकित हिन्दुस्तान

[
रेलयात्रा;भोपाल विदिशा :३०.०१.२००७]






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Saturday, December 18, 2010

पर्यावरण बनाम विकास

घोर प्रदूषण घेर में, संस्कृत और समाज
जल थल नभ में छा गया ,घोर प्रदूषण राज़
जल ज़मीन जंगल जले ,फोटे जाते क़ी क़ी
उद्योगों क़ी जम रही ,बड़े घरों में साख jal
जल ज़मीन जंगल जुड़े ,जिन लोगों के साथ
घोर प्रदूषण मार से ,ठोंके अपना माथ
डिज़िटल तकनीकें सभी ,जपती जैसे मन्त्र
निष्क्रिय होने पर बुने ,सभी विषैले तंत्र
सकल सूचना तंत्र का ,तन मन झेले भार
मनोरोग की जड़ों से ,जोड़े झटपट तार
धरती माँ को चद रहा ,जैसे जैसे ताप
जनगण मन का बढ़ रहा ,बैसे ही अनुताप
धरती माँ के खनन का ,पनप रहा उद्ध्योग
घोर प्रदूषण को मिला ,जोड़ गुना का योग
सागर तट को पाटना ,जन संख्या की बाढ़
बाढ़ प्रलय तूफ़ान को ,बिन मागीं है आड़
वन उपवन रकबा घटा ,बारिश को अभिशाप
सागर से लाई हवा,धुल चाटती भाप
चाँद ध्रुवों पर चल रहे, जितने भी अभियान
हाथों को ना काम हो ,खाने को ना कौर
क्यों ना उगले आग फिर ,अपराधों का दौर
हर विकास की योजना ,बन जाए जब कंस
मौज उड़ाते काग सब ,धुल चाटते हंस
[भोपाल:१८.८२.१०]

Saturday, September 25, 2010

ओज़ोन विश्व दिवस

जनसँख्या की बाढ़ से,उपजें जक्तिल सवाल
तापमान का मचलना ,सबसे बड़ा बबाल
ग्रीन हाउस के छेद का ,पसर रहा भूगोल
पंख न उसके यदि कटे ,आयेगा भूडोल
घोर प्रदूषण के थमेअगर ना बढ़ते पाँव
खुशहाली संसार की हार जायेगी दाँव
बर्फ ध्रुवों की पिघलना, अपशकुनी अभियान
सागर तट की आन का ,धराध्वस्त हो मान
ग्लेशियर सब पिघलकर ,कर देंगे उद्विग्न
सागर तट की बस्तियां ,सब होगीं जलमग्न
त्राहि ताहि मच जायेगी ,धुंआ धुंआ हों स्वप्न
मिटटी में मिल जायेंगे ,सब विकास के यत्न
तीखे तेवर ताप के ,खींचे अपने तीर
सर सरिता निर्झर कहें ,पीर हुई वेपीर
बेमौसम बरसात हो ,मरुथल का विस्तार
ऋतुओं का क्रम होबिफल ,तापमान की मार
ताप प्रदूषण कोख में,प्रलय स्रष्टि संहार
वन उपवन बन जायेगें ,सभी राख के ढेर
ताप प्रदूषण ना करे ,तनिक भी इसमें देर
लगातार ओजोन का, होता क्षरण घनत्व
जीवन कैसे खिलेगा ,बचे न जीवन तत्व
जीवन का आधार है ,जब ओजोन वितान
विश्व दिवस ओजोन पर क्यों न दे सम्मान
[विश्व ओजोन दिवस :१६.०९.१०]


Wednesday, September 15, 2010

एक बार ,बस,साल में

लोकतंत्र के पहरुए ,सब काले अँगरेज़
अंग्रेजी सिर पर चढी ,हिंदी से परहेज़
हिंदी को जग जानता ,जन मन गण की चीज़
हमें फिरंगी दे गए ,अंग्रेजी विष बीज
भाषण भाषा भाव में ,अंग्रेजी की गंध
सूरज चन्दा ने किये,खरे खरे अनुबंध
राजनीति तन मन बसा ,तोड़ फोड़ षड्यंत्र
भाषा ,जातिविबाद का ,जपती रहती मन्त्र
आकर हिंदी गाँव से.होय शहर में मौन
अंग्रेजी के सामने ,पूछे उसको कौन
न्यायालय के कंठ में ,अंग्रेजी के बोल
हिंदी जाती है बहाँ ,रोज़ चुकाने मोल
मंदिर मस्जिद तीर्थ में ,सेना या बाज़ार
हिंदी साधू संत की ,बने गले का हार
ताले खोलें तालियाँ ,अंग्रेजी का मन्त्र
हिंदी का सिम सिम लगे,शासन को षड्यंत्र
पद पाने की होड़ में ,अंग्रेजी अनमोल
उत्तर हिंद में दिए ,बिस्तर उसका गोल
जहां कहीं हिंदी करे ,हिंदी में फ़रियाद
अंग्रेजी में फिर बहाँ ,घाटों चले विवाद
हिंदी की खा रोटियाँ ,होनी से परहेज़
सोचो तो उनसे भले ,सचमुच में अँगरेज़
भावी पीढी गा रही,अंगेरजी के गीत
हिंदी बरसों बाद भी ,रहती है भयभीत
रोज़ मीडिया परसता,अंग्रेजी में प्रश्न
सपने हीनी के छीने,लटके अनगिन प्रश्न
त्याग समर्पण सौंप दे ,हिंदी को वर्चश्व
पिघल पिघल बह जाएगा,अंगेरजी सर्वस्व
अंग्रेजी रंग में रंगा ,लोकतंत्र का तंत्र
एक बार बस साल में ,जपता हिंदी मन्त्र
हिंदी की है दुर्दशा ,अंग्रेजी को मन
हीनी दिवस मना रहा ,रो रो हिन्दुस्तान
जब अपने ही राज में ,हिन्दी का अपमान
दुनिया हमसे पूंछती ,कैसा हिन्दुस्तान
[भोपाल:११..०९.०६]

Wednesday, March 31, 2010

प्रदूषण बनाम वैश्विक ताप

करते वातावरण विद ,खरा खरा एलान
प्रलय बाढ़ ने कस लिए,अपने तीर कमान
कोपेनहेगन में हुआ ,खूब विचार विमर्श
बढ़ते वैश्विक ताप पर ,निकले सच निष्कर्ष
आतंकी का रूप धर ,आया वैश्विक ताप
छोटे मोटे द्वीप तट ,झेल रहे अभिशाप
छानी छप्पर टपरिया ,शिमला नैनीताल
सभी जगह भूचाल मौसममें अब आ गया
भूल गया पारा अरे ,परम्परागत चाल
बैरोमीटर की कहीं ,अब ना गलती दाल
हवा हवा की निकलती ,हुई हवा हैरान
लूह लपट के रूप में ,बनी क्रूर शैतान
सांसत में अब फंस गयी ,तापमान की सांस
ग्लोवलवार्मिंग की सजा ,पडी गले में फांस
दलने छाती पर लगीं ,रवि किरणें जब दाल
तापमान के आन की काम न आये ढाल
बर्फ ध्रुवों की पिघलती ,धरे भैरवी रूप
पशु पंछी इन्शान के ,रही नहीं अनुरूप
ग्लेशियर अब हो रहे ,शनैः शनैः बीमार
बाद प्रलय की सूचना ,जन जीवन संहार
बाहन ढेरों चिमानियाँ ,उगल रहीं अभिशाप
पर्दूषण भूगोल का ,हुआ असीमित माप
वन उपवन के गाँव में ,कांक्रीट की बाढ़
मरुथल पाँव पसारता ,मिटे झाड झंकाड़
पानी पानी हो गए ,अब जलधर के ठाट
माथा अपना ठोकते ,कुआं बाबड़ी घाट
भ्रष्टाचारी प्रदूषण ,रचे नया इतिहास
सब दुनिया को हो गया ,खरा खरा अहसास
ग्रीनहाउस के छेद का ,बदल रहा भूगोल
थमीं नहीं यदि चाल तो ,आएगा भूडोल
घोर प्रदूषण यातना ,हम सबका है पाप
आने वाली पीदियाँ ,भोगेगी अभिशाप
जब दुनिया हो जाएगी,बाढ़ प्रलय जलमंग्न
[भोपाल:०१.०४.१०]

Sunday, January 24, 2010

माँ की ममता

माँ की ममता के लिए मिले नहीं उपमान
ढूंढ ढूंढ कर थक गए तुलसी सूर महान
किलकारी जब खेलती ,खेले सब संसार
परिजन मन मन हीं man hanse

Saturday, January 16, 2010

आनंद क दोहे :मुस्कान

राई -सी मुस्कान से ,पर्वत जैसे पीर
पानी पानी बन झरे ,जैसे निर्झर नीर
अधरों से मोनालिसा ,बाँट रही मुस्कान
मरकर भी जीवित अभी ,कला जगत की शान
सुरा सुरैया माधुरी ,मधुर अधर मुस्कान
आँख मींच पहचान लो ,जाने सकलjahaan

Sunday, June 21, 2009

बारहमासा दोहों में

महुआ जामुन आम का ,बौराए जब बौर
हसीं खुशी से चेत में , सब के मुह में कौर
सरसों गेहूं चना से ,मुस्काये जब खेत
होरी को बैशाख दे ,नवजीवन संकेत
रो रोम से जब बहे ,नदी पसीना धार
जेठ दुपहरी तब करे ,वार वार ,बस वार
कजरारे घन सघन हों ,बरसें कहें अषाढ़
दादुर मोर किसान के ,घर खुशियों की बाढ़
सावन की रिमझिम भली ,भाइ बहन त्यौहार
दार दार झूला परे,पेंगों का उपहार
थामे ण भादों में अरे ,वर्षा की रफ़्तार
छानी छप्पर सिसकते ,जन जीवन लाचार
पित्रपक्ष पक्ष की धूम हो ,घर घर आय बुखार
मच्छर झींगुर काग का, स्वागत करे क्वार
अन्धकार को बिदा दें,दीवाली के दीप
राम आगमन अबध में कातिक लिखता टीप
अगहन अगवानी करे ,जाने गौना रीति
राधा सी नाचने लगे ,भूली बिसरी प्रीति
पूस मॉस में पेलती,क्रूर ठण्ड जब दंड
तब आलाव करने लगे ,कीर्तन भजन अखंड
माघ मास पाला पड़े ,हो किसान हैरान
फसलें ढोतीं है सदा ,अनचाहा नुक्सान
मन ब्र्न्दाबन रंग रागे ,बरसाने की फाग
गागुन वन वागन नाचे ,जले पलाशन आग
[भोपाल :०७.१०.ओ६]

Saturday, June 20, 2009

सन्नाटे में गाँव

बाग़ बगीचे गाँव में ,खो बैठे पहचान
आम जाम जामुन हुए ,बाज़ारों की शान
पीपल बरगद नीम ने ,खींच लिए हैं हाथ
हमने ही जबसे दिया ,नीलामी का साथ
ताल तलैया नहर के ,बदल गए हैं पाट
अन्धकार में रौशनी, लिए गाँव में हाट
गायब सब पगदंदियाँ ,खा चकबंदी मार
सड़कें जोडें गाँव के,अब शहरों से तार
सड़क गाँव को ले गई, फुटपाथों की छाँव
संनते में भटकते ,छानी छप्पर गाँव
अत पात पीले झरे ,खड़े पेड़ सब ठूंठ
जगर मगर सब शहर की ,गयी गाँव से रूठ
ठिठुर ठिठुर ठंडा हुआ ,होरी धनिया गाँव
रातरात भर तापता ,जान बचाय अलाव
घर आँगन बरसात में ,कीचड दलदल गाँव
पछताते नर नारियाँ,जामे रोग के पाँव
जमींदार खोखल हुए ,बेंचे खाएं खेत
धन दौलत इज्ज़त हुई,ज्यों मुठ्ठी में रेत
जिनके घर में थी नहीं ,कौडी भून्जीं भांग
हाथ पसारे गाँव की ,पूरी करते मांग
भूमिहीन हैं गाँव में ,ऋण से लदे किसान
दानों को मुहताज है ,संकट में ईमान
बांग न मुर्गों की मिले ,बन बागन में मोर
जकडे सारे गाँव को ,बाघ भेड़िया शेर
घर आँगन खलियान का ,बदल गया भूगोल
गली गली में डोलता ,राजनीति भूडोल
टॉप तमंचा गोलियाँ ,घर घर चौकीदार
पकड़ फिरौती मांग में ,शामिल रिश्तेदार
शाम ढले कपने लगे ,थर थर सारा गाँव
द्वार देहरी में बधें,नर नारी के पाँव
कहाँ न जाने खो गए ,रेशम से सम्बन्ध
खान पान अनुराग के ,भंग हुए अनुबंध
[भोपाल:२८.०१.०५]







Saturday, May 9, 2009

ग्रीष्म ऋतु अभिशाप


ग्रीष्म ऋतु ने दे दिया ,मौसम को अभिशाप
उछल कूद पारा करे ,नाप न पाता ताप
ग्रीष्म ऋतु की तपन ने ,मचा रखा उत्पात
डर के मारे छाँव भी,भूल गई औकात

तन तप तप कर छाँव का,सचमुच हुआ लकीर

झाँक झाँक दुरवीन से पागल हुआ कबीर

आठ आठ आंसू बहा ,छाँव न पाये चैन

खारा सागर चुक गया ,बिबस बिचारे नैन

बैठा राही छाँव से ,पुँछ रहा है राह

बेबस बेचारी हुई ,रोक न पाती आह

मन छाया का हो गया,साधू संत फ़कीर

परहित करने के लिए ,रहती सदा अधीर

बरगद की छाया घनी ,मजा लूटिये मित्र

धूपहवा मिल रच रहे ,मर्ग तृष्णा के चित्र

मौसम पत्थर दिल हुआ ,उगल रहा अंगार

जन जीवन बेबस हुआ ,मुंह बाए संहार

टीn

Monday, April 27, 2009

आनंद के दोहे

वे दिन सपने हो गये ,हरा भरा सब ओर
बहो में हम सब बधे,रात हुई कब भोर

घर से बाहर पग धरें ,मन घर में रह जाय
फाइल अल्बम सी लगे ,काम न बिल्कुल भाय

स्वेटर हम बुनते रहे ,गर्म प्यार का ऊन
उटकमंड मंसूरिया ,घूमे देहरादून

प्यास बुझाए ना बुझे ,मरुथल जैसी प्यास
स्वर्गिक सुख में डूबते ,खोते होस हवास

घर ग्रहस्थी बढ़ती गयी ,खर्चों का सैलाव
हुईं सयानी बेटियाँ , दान मांग प्रस्ताव

जरा सौंप खुश हो रहा भूख प्यास औ' हार
जैसे सागर शांत हो ,गुजर जाय ज्यों जुवार

भोगे सपनों के सभी टूट गए संदर्भ
रथ कैसे आगे बढे ,थके थके गन्धर्व

सभी कथानक हो गए ,धीरे धीरे मौन
बूढी -टूटी नाव से ,हाथ मिलाये कौन

जितने अल्प बिराम थे ,हो गए पूर्ण विराम
भूख थमी करने लागी ,सुबह शाम आराम

लाल लाल काले हुए ,कमल सरीखे गाल
अनगिनती झुर्री भरा ,पछताता है भाल
[प्रकाशित प्रेस्मेनभोपाल :२१.०३ .०९ प्रष्ठ१३.]